कोविड -19 जनित महामारी मेँ शिक्षा, स्वास्थ्य और बाल अधिकारों के ऊपर बढ़ा संकट

अमिताभ पांडेय, मित्र रंजन
पटना

राइट टू एजुकेशन फोरम, बिहार के द्वारा  “बिहार में शिक्षा और बाल अधिकारों का परिदृश्य : कोरोना संकट और लॉक डाउन का विशेष संदर्भ” विषय पर एक ज़ूम वेब संवाद का आयोजन किया गया, जिसमें फोरम के राष्ट्रीय संयोजक अम्बरीश राय, फोरम के प्रांतीय संयोजक डॉ अनिल कुमार राय, विजय कुमार सिंह, बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ एवं संपादक, प्राच्य सभा; जैनेन्द्र, सीमा राजपूत, डॉ॰ गीता वर्मा, केयर इंडिया, प्रत्यूष प्रकाश, एंजेला तनेजा, ऑक्सफैम इंडिया; अनुभूति पात्रा, मलाला फ़ंड; पंकज श्वेताभ, एक्शन एड इंडिया; राशि मित्रा, कैरिटास इंडिया; अजीता थॉमस, वर्ल्ड विज़न इंडिया; राजीव रंजन, बिहार बाल आवाज मंच; डॉ॰ अपराजिता शर्मा, काउंसिल फॉर सोश्ल डेवलपमेंट, दिल्ली; मोख्तारुल हक, बचपन बचाओ आंदोलन; राकेश, विकलांग अधिकार मंच; मित्ररंजन, सृजिता मजूमदार, स्कोर, उत्तर प्रदेश आरटीई फोरम के प्रांतीय संयोजक, संजीव सिन्हा समेत विभिन्न मंचों, संस्थाओं, संगठनों के लगभग 45 लोगों ने संवाद स्थापित किया। संवाद में आरटीई फोरम बिहार के जिला संयोजकों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों के अधिकारों के संदर्भ में जमीनी स्थिति से अवगत कराया। कार्यक्रम का संचालन डॉ अनिल कुमार राय ने किया, जबकि अम्बरीश राय ने विषय प्रवेश कराया। जैनेन्द्र कुमार ने मौजूदा स्थिति पर एक विस्तृत प्रेजेंटेशन रखा जबकि विजय कुमार सिंह ने अंत में पूरे संवाद पर एक सारगर्भित टिप्पणी की।

फोरम के राष्ट्रीय संयोजक अम्बरीष राय ने सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली और वर्तमान दौर मेँ उसपर निरंतर बढ़ते खतरे की पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि बिहार से काफी भारी संख्या में लोग बाहर जाकर काम करते हैं। राज्य की खराब आर्थिक हालत के कारण पैदा हुए माइग्रेशन के इस गंभीर मसले को सरकार लगातार छिपाती रही है। लेकिन “लॉक डाउन” ने सच्चाई को सामने ला दिया है। बिहार के लगभग एक करोड़ लोग भारत के विभिन्न प्रदेशों में जाकर काम करते हैं। बिहार सरकार इनकी कमाई को अपने हिस्से में मानकर विकास की बात करती है। जब इन श्रमिकों पर आफत आई तो इन्हें राज्य में लाने से भी मना करती रहीं। येनकेन प्रकारेण लोग जिंदगी को दांव पर लगा कर पहुंच रहे हैं, कुछ ने तो रास्ते में ही दम तोड़ दिया। यहाँ पहुँचने के बाद भी “क्वेरेन्टीन केंद्रों” में उन्हें न तो सम्मानजनक व सुरक्षित तरीके से खाना मुहैया कराया जा रहा है और न अन्य सुविधाएं दे रही है।  लोग नारकीय स्थिति में 14 दिन काटने को मजबूर हैं। अब इन प्रवासी मजदूरों के बच्चों की शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं की भीषण समस्या मुंह बाए खड़ी है। पहले से ही गरीब, वंचित समाज के बच्चे स्कूल से बाहर रहते थे, अब उसमें और बढ़ोत्तरी होगी। सरकार की नजर इन बच्चों पर नहीं है। ऐसे में बाल-श्रम, बाल-विवाह, बाल-व्यापार का ख़तरा काफी बढ़ता दीख रहा है, विशेषकर लड़कियों की शिक्षा तो बड़े पैमाने पर प्रभावित होने की संभावना है। सामाजिक सुरक्षा के मुद्दे भी सामने आएंगे जो सरकार की जवाबदेही है। उन्होंने कहा कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना होगा। साथ ही, शिक्षा के अधिकार के तहत उल्लिखित पड़ोस में विद्यालय के प्रावधान पर संजीदगी से अमल किया जाना जरूरी है।

केयर इंडिया के जैनेन्द्र ने कहा कि जिस प्रकार मजदूर घर वापस लौट रहे हैं, उनके लिए व्यवस्था सरकार को करनी होगी। उनके बच्चों को विद्यालय तथा आँगनवाड़ी की सुविधाएं मिले, इसके लिए अभी से प्रयास शुरू करना चाहिए। उन्होने आंकड़े दिये कि अभी तक कितने लोगों ने वापसी के लिए पंजीकरण कराया है और कितने लोग वापस लौट चुके हैं। ऑक्सफैम के प्रत्यूष प्रकाश ने कहा कि मनरेगा के तहत जेसीबी से काम कराया जा रहा है जबकि जरूरतमंद लोगों को काम नहीं मिल रहा है। मुखिया तथा ग्राम-सेवक के द्वारा मजदूरों को छला जा रहा है। जनवितरण की दुकान भी निर्धारित मात्रा में अनाज उपलब्ध नहीं करवा रहे हैं। प्रांतीय संयोजक डॉ अनिल राय ने कहा कि शिक्षा अधिकार कानून को जमीन पर लागू करने के लिए सरकार को मजबूत इच्छाशक्ति दिखानी होगी, तभी सभी बच्चों को पढ़ने का अवसर मिल पायेगा, अन्यथा राज्य अपने बच्चों को केवल मजदूर बनाकर अन्य राज्यों में जीविकोपार्जन के लिए भेजता रहेगा। उन्होंने चेताया कि बिहार में तो पहले भी महज 2 फीसदी स्कूल ही शिक्षा अधिकार कानून, 2009 को लागू कर पाये थे और अब संकट की घड़ी में तो हालात और खराब हो जाएंगे।

विभिन्न जिलों से शिरकत कर रहे लगभग सभी लोगों ने अपने विचार रखे और अन्य समस्याओं के साथ-साथ ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था की विसंगतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया। उन्होंने  एकमत से कहा कि यह पिछड़ी पृष्ठभूमि और वंचित समाज को शिक्षा की मुख्यधारा से और भी काट कर उन्हें हाशिये पर डालने की व्यवस्था है जो समावेशी और समान अवसर के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने के उनके नागरिक अधिकारों का भी उल्लंघन है। यह निर्णय किया गया कि सरकार तत्काल सभी प्रवासी मजदूरों के बच्चों का डाटा बनाये, मिड-डे मील, टीकाकरण और बच्चों के स्वास्थ्य पोषण आदि की उपयुक्त व्यवस्था तुरन्त सुनिश्चित की जाए। सर्वसम्मति से फैसला हुआ की यथाशीघ्र इन संदर्भों में एक ज्ञापन मुख्यमंत्री, जिलाधिकारी के साथ-साथ सम्बंधित शिक्षा विभाग को भेजा जाएगा। जब तक सरकार सभी व्यवस्था सुनिश्चित नहीं करेगी तबतक राइट टू एजुकेशन फोरम ज्ञापन के साथ-साथ अन्य माध्यमों और मंचों से हर बच्चे की शिक्षा और उनकी बेहतरी के लिए आवाज उठाते रहेगा।

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