मप्र लोकसभा चुनाव 2019 अंतिम चरण : किसानों की कर्जमाफी का मुद्दा बना चुनौती

 भोपाल(जनप्रचार.कॉम) । मालवांचल में मंदसौर ही वह जगह है,जहां बीते साल 6 जून को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रदेश में किसानों का दो लाख तक का कर्ज महज दस दिन में माफ करने की घोषणा की थी। इसके जरिए कांग्रेस ने प्रदेश में सत्ता तो हासिल कर ली लेकिन तब राहुल ने यह सोचा भी नहीं होगा,कि 11 महीने बाद उन्हें अपनी इस घोषणा के अमल को लेकर सफाई भी देनी  पड़ेगी। 
हाल ही में नीमच और इसके बाद खंडवा में जनसभा को संबोधित करने पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को कागज लहराकर किसानों से यह कहना पड़ा ,कि देखो हमने किसानों का कर्ज माफ कर दिया। सबूत के तौर पर वह कर्जमाफी योजना के हितग्राहियों में शामिल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के परिजनों के नाम गिनाना नहीं भूलते । सभा में बैठे किसान भी इस सफाई का मतलब बखूबी समझ रहे हैं और राहुल भी। योजना क्रियान्वयन की हकीकत किसी से छिपी नहीं है। 
कर्जमाफी को लेकर भाजपा बनी हमलावर 
कर्जमाफी योजना की खामियों को लेकर प्रदेश में विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी  ने जिस तरीके से इस मुद्दे को हवा दी उससे कांग्रेस बैकफुट पर आ गयी है। इसके चलते मुख्यमंत्री कमलनाथ को भी गत दिनों ट्वीट कर यह कहना पडा, कि कर्जमाफी वाकई इस चुनाव का एक बडा मुद्दा है। दरअसल,15 साल सत्ता में रहने वाली भाजपा पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों के मर्म को समझने में नाकाम रही और उसे सत्ता गवानी पड़ी। नतीजतन ,लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के राष्ट्रीय मुद्दों (राष्ट्रवाद व सुरक्षा )के इतर उसने कांग्रेस की कर्जमाफी योजना को लेकर निशाना साधा है। कर्जमाफी की खामियां गिनाने का वह कोई मौका नहीं चूक रही है।
इसे लेकर उसने कांग्रेस पर प्रदेश के किसानों को ठगने व छलने तक के आरोप लगाए। वहीं किसानों को यह भी बताया कि आर्थिक संकट से जूझ रही है और उसके पास संबंधित बैंको को देने के लिए धेला नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  इस मामले में एक बड़े  हमलावर बने हुए हैं। वह अपनी सभाओं में लगातार इस मुद्दे को उठाकर बता रहे हैं,कि कर्जमाफी के मामले में कमलनाथ सरकार की हालत “पैसा न धेला,भोजपुर का मेला” जैसी है।
कांग्रेस अपने वचन से मुकर गई है। सभी किसानों की कर्जमाफी की जगह वह अब फसलों के अल्पकालीन ऋण को माफ करने का आदेश निकाल रही है। इसमें भी कई ऐसे पेंच हैं कि ज्यादातर  किसानों को इसका लाभ ही नहीं मिलना। शिवराज  किसानों से यह कहने से भी नहीं चूकते कि पिछले विधानसभा चुनाव में जो गल्ती की इसे अब नहीं दोहराना। 
 बैंकों ने  बढ़ाई  किसानो की दुविधा 
वहीं किसान भी दुविधा में हैं। उनकी स्थिति ‘इधर कुंआ  उधर खाई’ जैसी बन गई है। कर्जमाफी के लिए बजट में महज 5 हजार करोड रुपए का प्रावधान कर  राज्य सरकार ने अपनी इस घोषणा पर अमल करने का प्रयास किया और 13 सौ करोड की राशि भी प्राथमिक सहकारी समितियों को आवंटित की,लेकिन करीब 48 हजार करोड रुपए के कर्ज की भारी-भरकम रकम के आगे यह राशि  ‘ ऊंट  के  मुंह  में जीरा’ साबित हो रही है।    
इस अल्प  रकम से इन समितियों से जुडे किसानों के छिटपुट कर्ज तो माफ हुए लेकिन राष्ट्रीयकृत बैंकों  के  कर्जदार किसानों का एक बड़ा वर्ग अब भी इस योजना का लाभ पाने से वंचित है। किसानों की चिंता यह कि दो माह बाद उन्हें खरीफ की तैयारी करनी है।  इसके लिए भी कर्ज की जरुरत होगी। किसान भले ही राज्य सरकार की बातों पर एक बारगी यकीं करलें लेकिन बैंकर्स को भरोसा नहीं है। उसने किसानों को ऋण वसूली के नोटिस थमाना शुरु कर दिए हैं।
कांग्रेस के समक्ष जनाधार को बचाए रखने की चुनौती  
पहले ही सूखे की मार झेल रहा मालवा-निमाड़ का किसान कांग्रेस पर कितना भरोसा जताता है,इसका खुलासा तो आगामी 23 मई को ही होगा। अलबत्ता कर्जमाफी के इस मुद्दे ने कांग्रेस की चिंता बढा दी है। अपनी  इसी घोषणा के बलबूते अंचल की 64 विधानसभा सीटों में से 35 पर सेंध लगाकर वह सत्ता में पहुंची है। 15 सालों का वनवास उसे आज भी सालता है और वह मालवा-निमाड में पाए अपने जनाधार को किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहती है।
   
इसके चलते कांग्रेस ने अंतिम दौर के इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। यहां तक कि पार्टी  के राष्ट्रीय  अध्यक्ष  राहुल गांधी,स्टार प्रचारक प्रियंका  वाड्रा  समेत तमाम स्टार प्रचारकों ने बीते एक सप्ताह में इस अंचल की ओर रुख किया है। पहले तीन चरणों में अपने चुनाव प्रचार से फारिक हो चुके प्रदेश के दिग्गज नेता कमलनाथ,दिग्विजय सिंह,ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इस यहाँ प्रचार पर पहुंचे। 
 मंत्रियों की साख  भी दाव पर 
यहीं नही ,मुख्यमंत्री कमलनाथ ने क्षेत्र के सभी मंत्रियों व विधायकों की भी जवाबदेही तय की है। उन्हें हर हाल में अपने क्षे़त्रों से कांग्रेस को बढ़त  दिलाने का लक्ष्य सौंपा गया है। माना जा रहा है,कि चुनाव बाद उनका परफार्मेंस भी आंका जाएगा। इसके आधार पर ही उनका आगे का भविष्य तय होगा। इनमें मंत्री जीतू पटवारी, सज्जन सिंह वर्मा, तुलसी सिलावट, सुरेंद्र सिंह बघेल, उमंग सिंघार, बाला बच्चन, सचिन यादव और विजयलक्ष्मी साधौ शामिल हैं।
गौरतलब है,कि पिछले विधानसभा चुनाव में मालवा- निमाड़ की 64 विधानसभा सीटों में कांग्रेस को 35 पर जीत मिली थी. इसके  दम पर कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हुई। फि लहाल उज्जैन की 8 में से कांग्रेस के पास 5 , धार में छह, रतलाम में 6  ,खरगोन 6 और खंडवा की आठ में से चार पर कांग्रेस का कब्जा है। कांग्रेस को यहां से दो निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी प्राप्त है। इंदौर में भाजपा  और कांग्रेस के पास चार-चार सीट हैं। वहीं, मंदसौर में कांग्रेस सबसे ज्यादा कमज़ोर है यहां भाजपा की 7 और कांग्रेस के पास सिर्फ एक सीट है। जबकि कर्जमाफी की घोषणा उसने इसी मंदसौर से की थी। 
भाजपा का फोकस भी मालवा-निमाड़ पर  
विधानसभा चुनाव में अपने कई अभेद गढो को गंवा चुकी भाजपा भी अंतिम दौर के चुनाव वाली इन आठों सीट पर फोकस किए हुए है। इसके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,  राष्ट्रीय  अध्यक्ष अमित शाह ,आधा दर्जन केंद्रीय मंत्रियों एवं अन्य वरिष्ठ नेताओं ने तूफानी जनसंपर्क व जनसभाएं कर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की है।दरअसल, मालवा भाजपा का गढ़  रहा है और अपने इस किले को बचाने में वह कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ना  चाहती। 
इस अंचल की सीटों के चुनाव परिणाम पार्टी के प्रदेश नेतृत्व व अन्य नेताओं का भविष्य भी तय करेंगे। यही वजह , कि  भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने इंदौर को आठों सीटों का सेंटर बना लिया है और वे यहां से व्यवस्था पर नजर रखे हुए हैं। ऐसी विधानसभा सीटें जो कांग्रेस के कब्जे वाली हैं वहां भाजपा पूरी ताकत लगा रही है।
दोनों दलों के बीच कड़े मुकाबले वाले क्षेत्रों में राष्ट्रीय नेताओं के दौरे रखे गए । पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी मालवा-निमाड़ में काफी सक्रिय रहे। 
अंतिम चरण की इन 8 सीटों पर सबकी नजर
अंतिम चरण में आगामी 19 मई को  मालवा निमाड़ की आठ लोकसभा सीटों पर वोट डाले जाएंगे। इनमें देवासए उज्जैनए धार, इंदौर, रतलाम.झाबुआ, खंडवा, खरगोन और मंदसौर शामिल है। इनमें पांच लोकसभा  सीटें आरक्षित हैं। बीजेपी ने इन सभी सीटों पर 2014 में जीत का परचम लहराया था। लेकिन रतलाम सांसद दिलीप सिंह भूरिया के निधन के बाद 2015 में हुए उप चुनाव में रतलाम -झाबुआ कांग्रेस के हिस्से में वापस आ गई थी। 
खास बात यह,कि क्षेत्र की सभी लोकसभा  सीटों में आठ-आठ विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें विधानसभा चुनाव 2018 से बदले सियासी समीकरण के आधार पर कांग्रेस को आधी सीटें जीतने की उम्मीद है। वहीं, भाजपा अपनी सात सीटें बचाए रखने के अलावा रतलाम पर भी नजर गढ़ाए हुए है। सियासी दलों का पूरा जोर अब इन्हीं सीटों पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी मध्यप्रदेश पर फोकस किया। 
                             इनके बीच होगा मुकाबला , नए चेहरे भी मैदान में 
धार (अनुसूचित जनजाति): इस लोकसभा सीट की छह विधानसभा सीटें कांग्रेस और दो भाजपा के पास हैं। 2014 में भाजपा की सावित्री ठाकुर 1 . 04 लाख मतों से जीतकर सांसद बनी थीं, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी 2. 20 लाख वोटों से पीछे हो गई है। 
इस बार भाजपा ने सावित्री का टिकट भी काट दिया है। यहां छतर सिंह दरबार और कांग्रेस के दिनेश गिरवाल में चुनावी टक्कर है।

 

इंदौर( सामान्य): इस सीट पर इस बार सुमित्रा महाजन की जगह भाजपा ने शंकर लालवानी को प्रत्याशी बनाया है। पिछले लोकसभा चुनाव में सुमित्रा महाजन 4. 66 लाख मतों से जीतीं थीं। अब ये लीड घटकर 95 हजार की हो गई है। 
यहां की चार विधानसभा सीटें कांग्रेस और चार भाजपा के पास हैं। कांग्रेस ने यहां से पंकज संघवी को प्रत्याशी बनाया है।
खण्डवा ( सामान्य): इस सीट की चार विधानसभा सीटें कांग्रेस और चार भाजपा के पास हैं। यहां से नंदकुमार सिंह चौहान पिछला चुनाव 3. 28 लाख मतों से जीते थे। अब 70 हजार का अंतर रह गया है। भाजपा ने एक बार फिर नंदकुमार सिंह चौहान को प्रत्याशी बनाया है तो कांग्रेस ने अरुण यादव को फिर मौका दिया है।
मंदसौर( सामान्य) :इस सीट से मौजूदा सांसद सुधीर गुप्ता पिछला चुनाव 3. 03 लाख मतों से जीते थे। ये अंतर घटकर अब 77 हजार का रह गया है। यहां की आठ विधानसभा सीटों में से छह सीट कांग्रेस के पास हैं,जबकि सिर्फ दो सीटों पर कांग्रेस काबिज है। भाजपा ने सुधीर गुप्ता को फिर प्रत्याशी बनाया है तो कांग्रेस ने दोबारा मीनाक्षी नटराजन को टिकट दिया है।
उज्जैन (अनुसूचित जाति) : भाजपा के चिंतामणि मालवीय ने 2014 में कांग्रेस के प्रेमचंद गुड्डू को 3. 09  लाख वोटों से करारी शिकस्त दी थी। विधानसभा चुनाव ने इस बढ़त को एक चौथाई से भी कम कर दिया है। अब यहां पर भाजपा सिर्फ 69 हजार मतों से आगे है। कांग्रेस के पास पांच विधानसभा क्षेत्र हैं, जबकि भाजपा के पास सिर्फ तीन सीटें हैं। यहां भाजपा ने चिंतामणि मालवीय का टिकट काटकर विधानसभा चुनाव हारे अनिल फिरोजिया को दिया है। वहीं, कांग्रेस ने बाबूलाल मालवीय को मैदान में उतारा है।
खरगोन (अनुसूचित जनजाति) : इस लोकसभा सीट के एक विधानसभा क्षेत्र में ही भाजपा जीत दर्ज कर पाई है। एक विधानसभा सीट निर्दलीय के पास तो छह सीटें कांग्रेस के खाते में हैं। 2014 में भाजपा के सुभाष पटेल 2. 57 लाख मतों से चुनाव जीते थे, लेकिन वे अब 10 हजार वोटों से पीछे हो गए हैं। भाजपा ने सुभाष पटेल का टिकट काटकर गजेंद्र पटेल को थमा दिया। कांग्रेस ने यहां डॉ. गोविंद मुजाल्दा को उतारा है।
रतलाम (अनुसूचित जनजाति) : कांग्रेस का गढ़ रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट 2014 की मोदी लहर में ढह गया था। 2015 के उपचुनाव में कांतिलाल भूरिया ने फिर कांग्रेस का झंडा फहराया था। इस क्षेत्र में पांच विधानसभा सीट कांग्रेस के पास तो तीन भाजपा के पास हैं। उपचुनाव में भूरिया 60 हजार वोटों से जीते थे,लेकिन अब उनकी बढ़त 29 हजार मतों की है। कांग्रेस ने कांतिलाल को फिर उम्मीदवार बनाया है। भाजपा ने विधायक जीएस डामोर को मैदान में उतारा है।
देवास ( अनुसूचित जाति) : 2014 में भाजपा के मनोहर उंटवाल ने कांग्रेस के सज्जन सिंह वर्मा को 2. 60 लाख मतों से हराया था, लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा 40 हजार वोटों से पिछड़ गई है। यहां की चार विधानसभा सीटें कांग्रेस के हिस्से में आ गई हैं. जबकि भाजपा के पास चार सीटें ही बची हैं। भाजपा ने जज की नौकरी छोडकऱ आए महेंद्र सोलंकी को उम्मीदवार बनाया है तो कांग्रेस ने कबीरपंथी भजन गायक पद्मश्री प्रहलाद टिपाणिया को टिकट दिया है।

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