जीवन अखंड है, न पूरब सत्य है, न पश्चिम : ओशो

पूर्व और पश्चिम दोनों ही तरह की जीवन-पद्धति के अपने गुण और अपने दोष हैं। पश्चिम ने सिर्फ जड़ों को ही स्वीकार किया और जड़ों में ही रत हो गया। उसने ऊपर से ठूंठ ही काट दिया है वृक्ष का। उसने फूलों के, पत्तों के आने की संभावना ही मिटा दी है, क्योंकि उनका कहना है, फूल सब झूठ हैं, सब सपने हैं, फूल कहीं आते नहीं।

जड़ें ही सत्य हैं। उन्हीं को पानी देना, उन्हीं की पूजा करना। तो पश्चिम जड़ों को बहुत पानी दे रहा है। जड़ें बहुत मोटी होती चली गईं। अब वे पृथ्वी के ऊपर भी निकलने लगी हैं। जड़ों का जाल ही फैलता चला जा रहा है, वह बहुत कुरूप है। क्योंकि उन जड़ों में फूल आने का उपाय न रहा। फूल पश्चिम ने अस्वीकार कर दिए हैं।

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पश्चिम है निपट भौतिकवादी और पूरब था निपट अध्यात्मवादी। यह दोनों ही अधूरी गलतियां हैं। आधे-आधे की भूल है। आज दूसरा डर यह है कि हम पुरानी भूल से बच कर कहीं पश्चिम की भूल न पकड़ लें, इसकी बहुत संभावना है।

इसकी बहुत संभावना है क्योंकि जब आदमी एक भूल छोड़ता है तो दूसरी अति पर, दूसरी एक्सट्रीम पर चला जाता है। घड़ी की पेंडुलम की तरह हमारा चित्त बाएं से जाता है तो फिर ठीक दाएं पहुंच जाता है।
और एक बहुत मजे की बात है, जब घड़ी का पेंडुलम बाईं तरफ जाता है, तब कभी खयाल नहीं किया होगा कि बाईं तरफ जाता हुआ पेंडुलम दाईं तरफ जाने की शक्ति इकट्ठी करता है। जितना वह बायां जाता है, उतना दायां जाने का मोमेंटम इकट्ठा करता है। जाता है बायां, तैयारी हो रही है दाएं जाने की। जाता है दायां, तैयारी हो रही है बाएं जाने की।

पश्चिम भौतिकता में बहुत गहरे गया है और उसकी तैयारी हो गई है अध्यात्म में जाने की। वह दूसरी अति की भूल करेगा। इसलिए महेश योगी या और किसी को पश्चिम में जो सम्मान मिलता है, वह दूसरी अति को दिया गया सम्मान है। वह पश्चिम दूसरी अति पर जाएगा।
और हम भी तैयार हो गए हैं यहां, अध्यात्म में बहुत गहरे चले गए हैं। अब हमारा पेंडुलम भौतिकवाद की तरफ जाने की तैयारी में है। तो आज हमारा युवक अगर भौतिक को, शरीर को बहुत सम्मान दे रहा है, आदर दे रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं है, वह दूसरी अति में जाने की कोशिश कर रहा है। खतरा यह है कि कहीं पश्चिम पूरब न हो जाए और पूरब पश्चिम न हो जाए।

मैंने सुना है, एक गांव में ऐसा एक बार हुआ। एक गांव में एक बहुत बड़ा नास्तिक था और एक बहुत बड़ा आस्तिक था और दोनों गांव के लोगों को बहुत परेशान करते थे। आस्तिक कहता था कि ईश्वर है और सारे गांव को समझाता था। उसकी दलीलों में ताकत थी, जान थी। दूसरी ओर नास्तिक कहता था, ईश्वर नहीं है, उसकी दलीलें भी कम ताकतवर न थीं। थोड़ी ज्यादा ही ताकतवर थीं।

आस्तिक समझा जाता, नास्तिक मिटा जाता। नास्तिक समझाता, आस्तिक मिटा देता। गांव परेशान हो गया। गांव के लोगों ने कहा, तुम दोनों कोई निर्णय ही कर लो तो अच्छा था, ताकि हमारी परेशानी मिट जाए। एक पूर्णिमा की रात दोनों का विवाद हुआ। दोनों ने सख्त से सख्त दलीलें दीं – आस्तिक ने आस्तिकता की, नास्तिक ने नास्तिकता की। विवाद रात भर चला।

और आखिर सुबह परिणाम यह हुआ कि नास्तिक की दलीलों से आस्तिक प्रभावित हो गया और आस्तिक की दलीलों से नास्तिक प्रभावित हो गया। उस गांव में फिर एक आस्तिक रहा, फिर एक नास्तिक रहा। गांव की मुसीबत बरकरार रही, गांव की मुसीबत वही की वही रही।

आज पूरब पश्चिम को समझा रहा है, पश्चिम पूरब को समझा रहा है। धर्म के संबंध में पूछना हो तो पश्चिम पूरब के चरणों में आकर बैठता है। और विज्ञान के संबंध में पूछना हो, पूरब को पश्चिम के चरणों में जाकर बैठ जाना पड़ता है।

 

आज अगर विज्ञान की फिकर करनी हो, ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज, हार्वर्ड में बैठना पड़ता है। और अगर धर्म की फिकर करनी हो तो ऋषिकेश आना पड़ता है। लेकिन ये दोनों कहीं खतरा न हो जाए, जमीन फिर वही भूल में न पड़ जाए कि हम आधे-आधे फिर आधे-आधे बदल जाएं। उससे कुछ फर्क न पड़ेगा।

ध्यान में रखने वाली बात यह है कि भारत को अपने अतीत की भूल से बचना है। और पश्चिम की अतीत की भूल से भी बचना है। अगर मैं पश्चिम के लोगों से कहूं, तो उनसे भी कहूंगा कि तुम अपनी भूल से भी बचना, और भारत की भूल से भी बचना।

अन्यथा तुम भी मुश्किल में पड़ जाओगे। पूरी जिंदगी स्वीकृत होनी चाहिए। मेरा कहना है, भौतिकवाद जीवन का आधार बने, अध्यात्म जीवन का शिखर। न तो शिखर को इनकार करना उचित है, न बुनियाद को इनकार करना उचित है। जीवन इकट्ठा है।

विज्ञान और धर्म एक साथ स्वीकृत होने चाहिए। भारत में आने वाले विचारशील युवकों को कैसी जिंदगी बनानी है, उसको सोचते समय धर्म और विज्ञान दोनों के समन्वय पर दृष्टि रखनी होगी। ध्यान रखना होगा कि कहीं ऐसा न हो कि हम सिर्फ धर्म के आधार पर जिंदगी बना लें।

वह बड़ी कविता है, लेकिन कविता से पेट नहीं भरते। और कहीं ऐसा न हो कि हम विज्ञान के आधार पर जिंदगी बना लें। वह बहुत मजबूत रोटी है, लेकिन अकेली रोटी से आदमी तृप्त नहीं हो पाता।

जीसस का एक वचन है बाइबिल में : ‘मैन कैन नॉट लिव बाई ब्रेड अलोन”, आदमी अकेली रोटी से नहीं जी सकता। लेकिन यह अधूरा वचन है। आदमी बिना रोटी के भी नहीं जी सकता।

यह भी सच है कि आदमी बिना रोटी के भी मर जाएगा। और यह भी सच है कि आदमी को सिर्फ रोटी मिले, और कुछ न मिले तो भी मर जाएगा। ये दोनों बातें एक साथ सच हैं। अकेली रोटी तृप्ति नहीं दे सकती। और भी बहुत कुछ चाहिए। जिंदगी की बड़ी लंबी आकांक्षाएं हैं। जिंदगी बड़ी ऊंची उठना चाहती है। रोटी पर ही नहीं रुक जाना चाहती है।

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