नागपंचमी : परंपरा के माध्यम से पर्यावरण की चिंता

भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारे व्यवस्थाकारों ने इकोलॉजी को समझा और उस हिसाब से परंपराओं की रचना की। उसी परंपरा के तहत हमारे यहां पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों की पूजा का प्रावधान किया गया है। इसी के चलते हम श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी का त्यौहार मनाते हैं।

भविष्य पुराण में और महाभारत में नागपंचमी की पूजा का संबंध पाण्डव वंशीय राजा जनमेजय के नाग यज्ञ से भी बताया

इस दिन नाग देवता के 12 स्वरूपों की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने और रुद्राभिषेक करने से भगवान शंकर प्रसन्ना होते हैं और मनचाहा वरदान देते हैं। मान्यता यह भी है कि इस दिन सर्पों की पूजा करने से नाग देवता प्रसन्ना होते हैं।
नागपंचमी का महत्व
मान्यता है कि सर्प ही धन की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं और इन्हें गुप्त, छुपे और गड़े धन की रक्षा करने वाला माना जाता है। नाग, मां लक्ष्मी की रक्षा करते हैं। जो हमारे धन की रक्षा में हमेशा तत्पर रहते हैं। इसलिए धन-संपदा व समृद्धि की प्राप्ति के लिए नाग पंचमी मनाई जाती है। इस दिन श्रीया, नाग और ब्रह्म अर्थात शिवलिंग स्वरूप की आराधना से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और साधक को धनलक्ष्मी का आशीर्वाद मिलता है।
क्यों मनाया जाता है नागपंचमी का पर्व
नागपंचमी मनाने के पीछे कई प्रचलित कई कहानियां हैं। एक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के बाद जो विष निकला उसे पीने को कोई तैयार नहीं था। अंतत: भगवान शंकर ने उसे पी लिया। भगवान शिव जब विष पी रहे थे, तभी उनके मुख से विष का कुछ बूंद नीचे गिरी और सर्प के मुख में समा गई। इसके बाद ही सर्प जाति विषैली हो गई। सर्पदंश से बचाने के लिए ही इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है.

एक बार कालिया नाम के नाग ने प्रतिशोध में पूरी यमुना नदी में विष घोल दिया। इसके बाद यमुना नदी का पानी पीने से बृजवासी बेहोश होने लगे। ऐसे में भगवान कृष्ण ने यमुना नदी के अंदर बैठे कालिया को बाहर निकालकर उससे युद्ध किया।

युद्ध में कालिया हार गया और यमुना नदी से उसने अपना सारा विष सोख लिया। भगवान कृष्ण ने प्रसन्ना होकर कालिया को वरदान दिया और कहा कि सावन के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन नागपंचमी का त्योहार मनाया जाएगा और सर्पों की पूजा की जाएगी।

नागपंचमी की पूजा विधि
देश में अलग-अलग जगहों पर नागपंचमी की पूजा अलग तरीके से की जाती है। उत्तर भारत में लोग सुबह उठकर घर के आगे या पूजा स्थान पर गोबर से नाग बनाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। दक्षिण महाराष्ट्र और बंगाल में यह बड़ा पर्व होता है। केरल में शेषनाग की पूजा होती है। वहीं पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा में इस दिन नागों की देवी मां मनसा की पूजा की जाती है।
कुछ जातक इस दिन मां सरस्वती की पूजा भी करते हैं। दरअसल यह मान्यता है कि सर्पों में बहुत बौद्धिक बल होता है। इसलिए इस दिन सर्पों के साथ मां सरस्वती की भी पूजा की जाती है। घर की सुख-समृद्धि में वृद्धि के लिए भी इस दिन व्रत रखा जाता है। इससे सर्पदंश का भय दूर होता है।
पौराणिक कथाओं में नागदेवता
हिंदुओं के आराध्य देवताओं का सांपों के प्रति विशेष लगाव प्राचीन काल से ही है। शेषनाग पर लेटे भगवान विष्णु हों या फिर कंठ में सर्परूपी माला धारण करने वाले भगवान शिव। यहां तक कि माता पार्वती के कई मंदिरों में भी नागों की विशेष पूजा होती है। लोग मां दुर्गा के प्रारंभिक स्वरूप के रूप में भी नागों की पूजा करते हैं।

हिंदू पुराणों में नागों को पाताल लोक या फिर नाग लोक का स्वामी माना जाता है। नागपंचमी के दिन सर्पों की देवी मनसा की विशेष पूजा की जाती है। दक्षिण भारत में हिमालय श्रंखला के शिवालिक पर्वत पर मनसा देवी का विशाल मंदिर स्थित है।

मान्यता है कि भगवान शिव के अंश से ही मनसा देवी की उत्पत्ति हुई थी। इन्हें नाग समुदाय की देवी और नागराज वासुकी की बहन भी माना जाता है। मान्यता है कि नागपंचमी के दिन मनसा देवी की आराधना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और नाग दंश का भय दूर होता है।

एक अन्य मान्यता के तहत समुद्र मंथन से निकले हलाहल की कुछ बूंदों को सांपों ने पी लिया। इसके बाद से सांप जहरीले हो गए। इसलिए अपने परिवार को नागदंश से बचाने के लिए नागपंचमी के दिन भक्त सर्प देवता की पूजा करते हैं। भविष्य पुराण में और महाभारत में नागपंचमी की पूजा का संबंध पाण्डव वंशीय राजा जनमेजय के नाग यज्ञ से भी बताया गया है।

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