फैसले से कम हो गए फासले

 अयोध्या                                                 
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में फैसला सुनाए जाने के एक दिन बाद लखनऊ-फैजाबाद राजमार्ग से दूर मुस्लिम बहुल गांव रौनाही में शांत स्वीकृति की हवा चल रही है। जहां मंदिर निर्माण होना है, वहां से मात्र 20 किलोमीटर दूर पैगंबर के जन्मदिन की तैयारियां चल रही थीं, मिठाई की प्लेट और शीतल पेय के गिलास सजाए जा रहे थे। सफेद कपड़ों में बच्चे और पुरुष आपस में मिल रहे थे।

9 नवंबर की रात फैसले से जो भारी माहौल बना था, उसके विपरीत लोग बेहद सहज मनोदशा में दिख रहे हैं। जब जुलूस आता है, तब मुझे फिरोज खान उर्फ गब्बर से मिलवाया जाता है। उनका परिवार जुबेरगंज पशु बाजार का प्रबंधन संभालता है। वह जिले के सबसे अमीर व रसूखदारों में शुमार हैं। गब्बर बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। उन्हें विभिन्न समुदायों और पार्टियों से रिश्ते की वजह से भी जाना जाता है। वह समाज के स्थानीय लोगों का अभिवादन करते हुए कहते हैं, ‘यह जो फैसला है, वह देश के सद्भाव पर आधारित है। थोड़ी-सी कसक है, लेकिन हम इसके साथ रह सकते हैं। कम से कम अब हमारे हिंदू भाई मंदिर का निर्माण तो कर सकते हैं।'

अयोध्या में हिंदुओं के बीच आनंद का भाव है। जब फैसला आया, तब डाकघर के पास भोजनालय के मालिक राम वचन अग्रवाल ने लड्डू के दो डिब्बे देकर अपने कर्मचारी को निर्देश दिया कि वहां मौजूद हर व्यक्ति का मुंह मीठा कर दे।अग्रवाल कहते हैं, ‘अदालत को मंदिर के पक्ष में फैसला करना ही था, कोई और फैसला नहीं हो सकता था। यह सच्चाई की जीत है।'

कुछ विधि विशेषज्ञों ने फैसले पर सवाल उठाए हैं, लेकिन जमीनी आधार पर देखें, तो बहुमत में हिंदू और मुसलमान, दोनों को राहत का एहसास हुआ है। ज्यादातर लोगों को उम्मीद है, यह फैसला अयोध्या के इतिहास में निर्णायक मोड़ साबित होगा।

राम जन्मभूमि परिसर के बाहर, जहां अस्थाई मंदिर है, देश भर से आए सैकड़ों श्रद्धालु सुबह से दर्शन के लिए कतार में लगे हुए थे। कर्नाटक के 12 तीर्थयात्रियों का एक समूह सेल्फी लेने और अपने घर-परिवार के लोगों को वीडियो कॉल करने में व्यस्त था। विवादित परिसर से लगभग एक किलोमीटर दूर जानकी घाट के मधुरेश कुंज आश्रम में रामानुज दर्शन के 20 वर्षीय उपदेशक अच्युतानंद ने अपने साथी ब्रह्मचारियों के साथ फैसले का जश्न भी मनाया। अच्युतानंद एक वकील की तरह स्पष्ट जवाब देते हैं, ‘अब अयोध्या का 360 डिग्री विकास होगा। गुजरात में सोमनाथ जैसा भव्य राम मंदिर पूरे साल पर्यटकों को आकर्षित करता रहेगा, वहां हर किसी के लिए अधिक काम होगा और इसलिए अधिक समृद्धि आएगी।'

राम मंदिर को अयोध्या की सारी समस्याओं का समाधान या रामबाण बताना कोई नई सोच नहीं है। मंदिर समर्थक लॉबी सावधानीपूर्वक मंदिर को न केवल एकमात्र समाधान के रूप में पेश करती रही है, बल्कि इसे शहर की टूटी हुई नागरिक संरचना को फिर से खड़ा करने और रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में सबसे अच्छा भी मानती रही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं और साधुओं ने भी यह बयान दिया है कि अब अयोध्या का चहुंमुखी विकास होगा। वास्तव में यहां लोगों को उम्मीद है, राज्य व केंद्र सरकार इस शहर के विकास के लिए गंभीर है।

रोजी-रोटी का सवाल
अयोध्या में आमूलचूल बदलाव आएगा, यह उम्मीद भाजपा की भारी विजय के बाद से ही जगी हुई थी।जो मुसलमान अपनी आजीविका के लिए तीर्थयात्रा के बाजार पर निर्भर नहीं हैं, वे भी इस फैसले का समर्थन कर रहे हैं। एक अच्छे परिवार से ताल्लुक रखने वाले एहसान अली कहते हैं, ‘यह इतना अच्छा फैसला है कि मैं इसका इस्तकबाल रोक नहीं सकता। इस फैसले ने मेरे बेटों के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित कर दिया है।' एहसान अली का परिवार कम से कम आठ पीढ़ियों से अयोध्या के कटरा मोहल्ले में रहता आया है। वह कहते हैं, ‘अगर सुन्नी वक्फ बोर्ड समीक्षा याचिका दायर करता है, तो यह हमारे लिए बेकार और नुकसानदायक होगा। कोर्ट ने जो भी कहा है, उसे सभी को स्वीकार करना चाहिए। हां, यह बेहतर होता, अगर हम बातचीत से हल निकाल लेते, लेकिन जो हुआ है, साफ तौर पर मैं खुश हूं। बहुत हो चुका विवाद।'

अयोध्या में मुख्य सड़क पर स्थित मोहम्मद शाहिद का घर पिछले कुछ दिनों से बंद पड़ा है। वह फोन पर बताते हैं, ‘मेरी पत्नी ने जोर दिया कि फैसले से पहले ही हम यहां से चले जाते हैं, इसलिए हम एक रिश्तेदार के यहां गोंडा आ गए।' शाहिद 17 साल के थे, जब 6 दिसंबर, 1992 को उनके पिता की हत्या हुई थी। इस हादसे के कारण उनका लकड़ी का जमा-जमाया पारिवारिक कारोबार ध्वस्त हो गया। शाहिद अब ई-रिक्शा चलाते हैं। वह कहते हैं, ‘मुझे उम्मीद है कि इस फैसले से विवाद थम जाएगा। मैं कल अयोध्या लौट रहा हूं और मुझे उम्मीद है, हमें फिर इस तरह कभी शहर नहीं छोड़ना पड़ेगा।'

आगे की राह
अयोध्या-फैजाबाद में सभी मुसलमानों और हिंदुओं को यह यकीन नहीं है कि विवाद का अंत हो गया है। अयोध्या से सटे शहर फैजाबाद में मुसलमानों का एक वर्ग इस फैसले से निराशा भी महसूस कर रहा है। टाइटल सूट या भूमि विवाद में याचिकाकर्ता महफूजुर रहमान के नामांकित प्रतिनिधि खलीक अहमद खान कहते हैं, ‘यह कई कमियों वाला विरोधाभासी फैसला है। मैं मानता हूं कि अदालत की मंशा एक संतुलन खोजने और उसका सम्मान करने की थी, लेकिन मैं खुश नहीं हूं।' खान की चिंता है कि बनारस, मथुरा में राम मंदिर आंदोलन दोहराने के लिए सांप्रदायिक ताकतें इस फैसले का दुरुपयोग कर सकती हैं। उन्हें यह भी डर है कि इस फैसले से अयोध्या की हर मस्जिद असुरक्षित हो गई है।

दूसरी ओर, बाबा शिव दास जैसे साधुओं के लिए भी विवाद खत्म नहीं हुआ है, निर्मोही अखाड़े की याचिका खारिज करने के फैसले को कोर्ट में फिर चुनौती मिल सकती है। वह कहते हैं, ‘किसी भी निष्कर्ष से पहले कुछ समय प्रतीक्षा कीजिए।' 

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