क्या संघ भारतीय जनता पार्टी से दूरी बना रहा है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दिल्ली में तीन दिनों की व्याख्यानमाला बुधवार को समाप्त हो गई. इन तीन दिनों में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उन सभी बिंदुओं पर अपना रुख स्पष्ट किया जिन पर सवाल उठते रहे हैं.

MOHAN BHAGWAT

उन्होंने कहा कि संघ गोरक्षा में विश्वास तो रखता है पर हिंसा का कतई समर्थन नहीं करता. वो भारत के संविधान को मानते हैं, धर्मनिरपेक्षता को मानते हैं, राजनीति में विपक्ष की भूमिका का समर्थन करते हैं और सभी को साथ लेकर चलने की बात कहते हैं.

उन्होंने यह कहा कि वो भारतीय जनता पार्टी के कांग्रेस मुक्त भारत का समर्थन नहीं करते हैं. वो समर्थक हो या विरोधी, सभी को अपना मानते हैं.

ऐसा लगा कि आरएसएस खुद को मुख्यधारा में लाना चाह रहा है और अपनी छवि को बदलने की कोशिश कर रहा है.

संघ ऐसा क्यों कर रहा है और इस वक़्त ही क्यों कर रहा है, ये अलग सवाल हो सकते हैं, जिन पर चर्चा की जा सकती है.

 

उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान में रहने वावे सभी लोग हिंदू हैं. ये पुराना रवैया रहा है और संघ यह कहता रहा है कि मुसलमान भी हिंदू हैं.
भारत में लोग हिंदू शब्द को एक धर्म के रूप में लेते हैं. ऐसे में संघ को मुसलमानों को हिंदू बोलने के बजाए उन्हें भारतीय बोलना चाहिए था.

मुसलमान भी हिंदू शब्द को एक धर्म के रूप में देखते हैं. ऐसे में मोहन भागवत को इस शब्द का इस्तेमाल उनके पुराने रुख़ को दर्शाता है.

हालांकि कुछ दिन पहले तक सख़्त भाषा का प्रयोग करने वाले मोहन भागवत की बोली अचानक बदली नज़र आई. यह ग़ौर करने वाली बात है.

ग़ौर करने वाली दूसरी बात यह है कि इन सबकुछ कहने के लिए यह वक़्त ही क्यों चुना गया.

इन दोनों बातों पर आप थोड़ा दिमाग चलाएंगे तो पता चलेगा कि संघ की नज़र अब लिबरल हिंदू पर है. वह चाहता है कि हिंदू, जो लिबरल सोच रखते हैं, उन्हें अपने पक्ष में लाया जाए.

ये लिबरल हिंदू कुछ चीज़ों से ख़फा चल रहे थे, चाहे लींचिंग का मामला हो या फिर लव जिहाद का. भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारत जैसी बातों से वो तबका नाराज रहा है क्योंकि उन्हें लगता है कि लोकतंत्र में इनकी ज़रूरत है और देश में एक पार्टी की सत्ता में उनका विश्वास कम है.

मोहन भागवत ने अपने भाषण से इन सभी नाराज़ लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की कि वो आधुनिकता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र में विश्वास करते हैं.

दूसरा कोशिश यह दिखाने की थी कि संघ भाजपा के नेतृत्व से दूरी बनाना चाहता है. संघ ने यह भी बताना चाहा कि वो वर्तमान सरकार से बहुत खुश नहीं है.

उन्होंने कहा कि आरएसएस के स्वयंसेवक किसी भी पार्टी को वोट दे सकते हैं, जबकि यह सभी जानते हैं कि संघ भाजपा के लिए राजनीतिक ज़मीन तैयार करता रहा है. इससे स्पष्ट होता है कि संघ भाजपा से दूरी बनाना चाहता है.

इसे दूसरे नज़रिये से देखें तो संघ, भाजपा के पर्याय बन चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह संदेश देना चाहता है कि उसके समर्थन के बिना पार्टी कुछ नहीं कर सकती है.

यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या संघ हर सफलता को नरेंद्र मोदी की कामयाबी बताने से नाराज़ है.

मोहन भागवत ने समलैंगिकता पर बात की. उन्होंने कहा कि उन्हें भी जीने का अधिकार है. ये सबकुछ लिबरल दिखने की कोशिश है.

इन सभी से हर तरह के हिंदू, चाहे वो सवर्ण हो या लिबरल सोच रखने वाले, सबको एक छत के नीचे लाने जैसी कोशिश है.

ये भी हो सकता है कि वो आगामी चुनावों के देखते हुए ऐसा बोल रहे हैं, क्योंकि कहीं न कहीं भाजपा को जिस तरह का समर्थन 2014 में मिला था, उसमें कमी आती दिख रही है.

अब देखने की बात यह होगी कि मोहन भागवत की नम्रता और उदारता के बाद बजरंग दल जैसे संगठन का बर्ताव भविष्य में कैसा होगा? [बीबीसी हिंदी न्यूज़ से साभार ]

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